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नाम लिए बिना ममता ने हुमायूँ पर साधा निशाना, घोषणा में दिखी स्पष्ट राजनीतिक रणनीति
कोलकाता। बंगाल में आगामी चुनावों से पहले एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला है। तृणमूल ने विधायक हुमायूँ कबीर को निलंबित कर दिया है, और यह निलंबन ठीक उस समय हुआ जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मुर्शिदाबाद में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। निलंबन की घोषणा के बाद ममता ने मंच से नाम लिए बिना हुमायूँ कबीर पर निशाना साधा और उन पर भाजपा के चमचे होने और ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया। भरतपुर के टीएमसी विधायक हुमायूँ ने लगभग डेढ़ महीने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह अपनी नई पार्टी बनाएंगे और 2026 का चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि वह बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक मस्जिद का निर्माण करेंगे, जिसका शिलान्यास कार्यक्रम 6 दिसंबर को है। वह नियमित रूप से टीएमसी के मुर्शिदाबाद-बहरमपुर संगठनात्मक जिले के अध्यक्ष अपूर्व सरकार (डेविड) को निशाना बना रहे थे, लेकिन अब तक टीएमसी उन्हें नजऱअंदाज़ कर रही थी।
सवाल यह है कि ममता की सभा से ठीक पहले उन्हें निलंबित करने का फैसला क्यों लिया गया? पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, यह फैसला सही समय देखकर लिया गया। ममता के जिले में रहते हुए हुमायूँ की सज़ा की घोषणा की गई। सूत्रों के मुताबिक, ममता ने बुधवार रात ही सज़ा को अंतिम रूप दे दिया था और इसकी घोषणा की जि़म्मेदारी फिरहाद हकीम को सौंपी थी। इस दौरान मुर्शिदाबाद से राज्य मंत्री अखरुज़्ज़मान और हरिहरपाड़ा के विधायक नियामत शेख को कोलकाता बुलाया गया। नियामत, हुमायूँ के करीबी माने जाते हैं। बॉबी के साथ ये दोनों भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे। टीएमसी मानती है कि बाबरी का नाम लेकर मस्जिद का उद्घाटन करना एक खुला धार्मिक ध्रुवीकरण है। इसलिए, 6 दिसंबर के कार्यक्रम से पहले उन्हें सज़ा देकर यह सुनिश्चित किया गया कि उस समय उन पर टीएमसी विधायक का ठप्पा न रहे।
टीएमसी के एक धड़े का मानना है कि हुमायूँ भाजपा के एक प्रभावशाली नेता के संपर्क में हैं और उनकी मदद से नई पार्टी बनाकर टीएमसी के अल्पसंख्यक वोट बैंक को तोडऩा चाहते हैं। हुमायूँ का पहले भाजपा में जाने का इतिहास रहा है, इसलिए ये खबरें पूरी तरह से अविश्वसनीय नहीं हैं। अल्पसंख्यक वोटों को लेकर ममता और टीएमसी हमेशा से ही संवेदनशील रहे हैं। ममता ने बहरमपुर की सभा से हुमायूँ का नाम लिए बिना कहा कि वोट से पहले कई लोग ब्लैकमेल करते हैं। भाजपा का पैसा खाकर चमचागिरी करते हैं। उन पर विश्वास न करें।
उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवारों को भी वोटकटवा न बनने देने की चेतावनी दी और बिहार का उदाहरण दिया। ममता ने कहा कि कुछ कीड़े-मकौड़े होंगे ही। वे प्रकृति के जीव हैं। उन्हें हटाकर अपना काम करें। अल्पसंख्यक नेता हुमायूँ को सज़ा देते समय ममता को एक और बात का ध्यान रखना था: यह फैसला किसी भी तरह से गलत ढंग से न समझा जाए कि वह एक अल्पसंख्यक जनप्रतिनिधि को सज़ा दे रही हैं। इसी वजह से, हुमायूँ के निलंबन की घोषणा अल्पसंख्यक नेता फिरहाद हकीम ने की, जो न केवल ईद की दावत देते हैं, बल्कि चेतला में कोलकाता की सबसे बड़ी दुर्गा पूजाओं में से एक का भी आयोजन करते हैं। इसलिए फिरहाद के माध्यम से निलंबन की घोषणा करवाना टीएमसी का एक सोचा-समझा राजनीतिक फैसला माना जा रहा है। इसी कारण बॉबी के साथ मुर्शिदाबाद के दो अल्पसंख्यक विधायक भी मौजूद थे। ममता ने वक्फ संपत्ति के विवरण को केंद्रीय पोर्टल पर दर्ज करने के सरकारी निर्देश के बारे में अल्पसंख्यक समुदाय के बीच चल रही अफवाहों पर भी चिंता जताई। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि मुर्शिदाबाद में नई हिंसा की साजि़श रची जा सकती है।
ममता ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से कुछ उपद्रवी अफवाह फैला रहे हैं कि राज्य सरकार ने मस्जिदों, कब्रिस्तानों और धार्मिक स्थलों को कलेक्टर के खतियान नंबर में दर्ज कर लिया है। यह झूठ है! हर धर्म में कुछ गद्दार होते हैं जो भाजपा का पैसा खाकर झूठा प्रचार करते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी साजि़शें दोबारा रची जा रही हैं, ताकि चुनाव से पहले लोगों को एनआईए के माध्यम से गिरफ्तार कराया जा सके। वर्तमान राजनीतिक स्थिति में ममता जिन स्थानों पर जनसभाएं कर रही हैं, वे भी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, मतुआ वोट पिछले कुछ चुनावों में टीएमसी से दूर रहे हैं, लेकिन अल्पसंख्यक वोट अभी भी ममता के साथ मजबूती से खड़े हैं। भाजपा जब हिंदू वोटों को एकजुट करने की रणनीति पर चल रही है, तो ममता का अपने वोट की पूंजी को सुरक्षित रखना स्वाभाविक है। हुमायूँ ने घोषणा की है कि वह अगले एक-दो दिनों में विधायक पद से इस्तीफा दे देंगे और 2026 के विधानसभा चुनावों में अपनी नई पार्टी के साथ उतरेंगे।
उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी 135 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और टीएमसी-भाजपा को अपनी ताकत दिखाएगी। हालांकि, टीएमसी के कई बड़े नेता हुमायूँ के प्रभाव को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। एक नेता ने कहा कि अगर हुमायूँ का व्यक्तिगत प्रभाव इतना होता, तो उन्हें इतनी बार पार्टी नहीं बदलनी पड़ती! हुमायूँ ने पहले कांग्रेस, फिर टीएमसी, फिर भाजपा और फिर से टीएमसी में वापसी की थी। अब घटनाक्रम बता रहे हैं कि वह 2026 के चुनाव में टीएमसी में नहीं रहेंगे। इस घटना को कई लोग पिछले लोकसभा चुनाव से पहले अर्जुन सिंह के घटनाक्रम से जोड़कर देख रहे हैं। अर्जुन सिंह भी ब्रिगेड रैली में ममता के मंच पर थे, लेकिन टिकट न मिलने पर मंच छोड़कर सीधे भाजपा में शामिल हो गए थे। हुमायूँ तो मंच पर भी नहीं चढ़ पाए!